“भारत में जन्म लेने वाला हर इंसान बराबर है — चाहे उसका धर्म कुछ भी हो, जाति कुछ भी हो, लिंग कुछ भी हो, जन्मस्थान कहीं भी हो।”
यह केवल एक आदर्श वाक्य नहीं है — यह भारत के संविधान का अनुच्छेद 15 है। वह अनुच्छेद जिसने उस देश में समानता की गारंटी दी जहाँ सदियों से जाति, धर्म और लिंग के आधार पर भेदभाव होता आया था।
भारत के संविधान के भाग III (मौलिक अधिकार) में अनुच्छेद 14 से 18 तक समता का अधिकार (Right to Equality) दिया गया है। इनमें अनुच्छेद 15 सबसे विस्तृत और सामाजिक दृष्टि से सबसे महत्वपूर्ण है।
अनुच्छेद 15 न केवल भेदभाव को रोकता है — बल्कि साथ ही यह उन वर्गों के लिए विशेष प्रावधानों की अनुमति भी देता है जो सदियों से पीछे रहे हैं। यही उसकी जटिलता है और यही उसकी महानता भी।
इस लेख में अनुच्छेद 15 के सभी खंडों, ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, महत्वपूर्ण न्यायिक निर्णयों, व्यावहारिक उदाहरणों और UPSC की दृष्टि से सभी तथ्यों को विस्तार से समझाया गया है।
एक नज़र में अनुच्छेद 15 | Quick Facts
| विषय | विवरण |
|---|---|
| अनुच्छेद | 15 |
| भाग | भाग III (मौलिक अधिकार) |
| शीर्षक | धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग या जन्मस्थान के आधार पर विभेद का प्रतिषेध |
| किससे लिया गया | अमेरिकी संविधान के समान संरक्षण के सिद्धांत से प्रेरित |
| खंड | अनुच्छेद 15(1) से 15(6) — कुल 6 खंड |
| मूल खंड | 15(1) और 15(2) — संविधान से |
| बाद में जोड़े गए | 15(3), 15(4), 15(5), 15(6) |
| सबसे नया खंड | 15(6) — 103वाँ संशोधन, 2019 (EWS आरक्षण) |
| प्रवर्तनीयता | न्यायालय में प्रवर्तनीय |
| संबंधित अनुच्छेद | 14, 16, 17, 46 |
| संबंधित कानून | सिविल अधिकार संरक्षण अधिनियम 1955, भेदभाव निषेध |
अनुच्छेद 15 की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि | Historical Background
औपनिवेशिक भारत में भेदभाव
1947 से पहले भारत में भेदभाव की कई परतें थीं:
| भेदभाव का प्रकार | विवरण |
|---|---|
| जाति आधारित | दलितों को सार्वजनिक स्थलों पर प्रवेश निषेध |
| धर्म आधारित | हिंदू-मुस्लिम सार्वजनिक जीवन में अलगाव |
| लिंग आधारित | महिलाओं के लिए शिक्षा, सम्पत्ति, रोज़गार में भेदभाव |
| जन्मस्थान आधारित | प्रांतीय भेदभाव |
| अंग्रेज़ी नस्लभेद | गोरे-काले के बीच भेदभाव |
संविधान सभा के सदस्य इस सामाजिक यथार्थ से भली-भाँति परिचित थे।
डॉ. अम्बेडकर की भूमिका
संविधान के मुख्य निर्माता डॉ. बी.आर. अम्बेडकर स्वयं दलित समुदाय से थे और जीवन भर जाति आधारित भेदभाव का शिकार रहे थे। उन्होंने संविधान सभा में जोर दिया कि केवल “कानून के सामने समानता” पर्याप्त नहीं है — समाज में व्याप्त संरचनात्मक असमानता को दूर करने के लिए विशेष प्रावधान भी ज़रूरी हैं।
यही कारण है कि अनुच्छेद 15 का स्वरूप दोहरा है — एक तरफ भेदभाव का निषेध, दूसरी तरफ पिछड़ों के लिए विशेष प्रावधान।
अनुच्छेद 15 का पूरा पाठ | Full Text of Article 15
अनुच्छेद 15(1) — मूल निषेध
“राज्य किसी नागरिक के विरुद्ध केवल धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग, जन्मस्थान या इनमें से किसी के आधार पर कोई विभेद नहीं करेगा।”
अनुच्छेद 15(2) — सार्वजनिक स्थलों पर निषेध
“कोई नागरिक केवल धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग, जन्मस्थान या इनमें से किसी के आधार पर — (क) दुकानों, सार्वजनिक भोजनालयों, होटलों और सार्वजनिक मनोरंजन के स्थानों में प्रवेश; अथवा (ख) पूर्णतः या अंशतः राजनिधि से पोषित या साधारण जनता के उपयोग के लिए समर्पित कुओं, तालाबों, स्नानघाटों, सड़कों और सार्वजनिक समागम के स्थानों के उपयोग; के संबंध में किसी निर्योग्यता, दायित्व, निर्बन्धन या शर्त के अधीन नहीं होगा।”
अनुच्छेद 15(3) — महिलाओं और बच्चों के लिए विशेष प्रावधान
“इस अनुच्छेद की कोई बात राज्य को महिलाओं और बच्चों के लिए कोई विशेष उपबन्ध करने से नहीं रोकेगी।”
अनुच्छेद 15(4) — सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्ग
“इस अनुच्छेद की या अनुच्छेद 29 के खंड (2) की कोई बात राज्य को सामाजिक और शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़े हुए नागरिकों के किन्हीं वर्गों की उन्नति के लिए या अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए कोई विशेष उपबन्ध करने से नहीं रोकेगी।”
अनुच्छेद 15(5) — शिक्षण संस्थाओं में आरक्षण
“इस अनुच्छेद की या अनुच्छेद 19 के खंड (1) के उपखंड (छ) की कोई बात राज्य को सामाजिक और शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़े हुए नागरिकों के किन्हीं वर्गों की उन्नति के लिए या अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए… शिक्षण संस्थाओं में प्रवेश के संबंध में विशेष उपबन्ध करने से नहीं रोकेगी।”
(93वाँ संविधान संशोधन, 2005)
अनुच्छेद 15(6) — EWS (आर्थिक रूप से कमज़ोर वर्ग)
“इस अनुच्छेद की कोई बात राज्य को आर्थिक रूप से कमज़ोर वर्गों के नागरिकों की उन्नति के लिए कोई विशेष उपबन्ध करने से नहीं रोकेगी।”
(103वाँ संविधान संशोधन, 2019)
अनुच्छेद 15 के खंडों को विस्तार से समझें | Understanding Each Clause
अनुच्छेद 15(1) — भेदभाव के पाँच आधार
यह खंड राज्य पर प्रतिबंध लगाता है। “राज्य” यहाँ केवल केंद्र या राज्य सरकार नहीं है — इसमें संसद, विधानमंडल, स्थानीय निकाय और सरकारी संस्थाएं सभी शामिल हैं।
भेदभाव के पाँच निषिद्ध आधार:
| आधार | विवरण | उदाहरण |
|---|---|---|
| धर्म | Religion | हिंदू/मुस्लिम/ईसाई के आधार पर भेद |
| मूलवंश | Race | नस्ल के आधार पर भेद |
| जाति | Caste | ब्राह्मण/दलित के आधार पर भेद |
| लिंग | Sex | स्त्री/पुरुष के आधार पर भेद |
| जन्मस्थान | Place of Birth | प्रांत/राज्य के आधार पर भेद |
महत्वपूर्ण: “केवल” (Only) शब्द पर ध्यान दें। इसका अर्थ है कि यदि भेदभाव केवल इन्हीं में से एक या अधिक आधारों पर हो तो वह निषिद्ध है। यदि भेदभाव का कोई और वैध कारण भी हो तो वह अनुमत हो सकता है।
उदाहरण: यदि किसी सरकारी नौकरी में शारीरिक परीक्षण की न्यूनतम ऊँचाई तय है — तो यह लिंग आधारित भेदभाव नहीं है क्योंकि इसका कारण रोज़गार की प्रकृति है, न कि केवल लिंग।
अनुच्छेद 15(2) — सार्वजनिक स्थलों का विशेष प्रावधान
यह खंड दो प्रकार के सार्वजनिक स्थलों पर भेदभाव का निषेध करता है:
श्रेणी (क) — व्यावसायिक स्थल:
- दुकानें
- सार्वजनिक भोजनालय/रेस्तराँ
- होटल
- सार्वजनिक मनोरंजन के स्थान (सिनेमाघर, पार्क आदि)
श्रेणी (ख) — सार्वजनिक उपयोगिताएं:
- कुएं और तालाब
- स्नानघाट
- सड़कें
- सार्वजनिक समागम के स्थान
ऐतिहासिक संदर्भ: यह खंड उस युग की भयावह वास्तविकता को दर्शाता है जब दलितों को कुओं से पानी नहीं लेने दिया जाता था, मंदिरों में प्रवेश निषेध था और सार्वजनिक सड़कों पर चलने की भी पाबंदी थी।
15(2) की विशेषता: यह खंड न केवल “राज्य” पर बल्कि सभी नागरिकों पर लागू होता है। अर्थात कोई भी व्यक्ति — सरकार हो या निजी — इन स्थलों पर पाँच आधारों पर भेदभाव नहीं कर सकता।
अनुच्छेद 15(3) — महिलाओं और बच्चों के लिए
यह खंड एक अपवाद (Exception) है। यह राज्य को महिलाओं और बच्चों के लिए विशेष प्रावधान बनाने की अनुमति देता है।
क्यों आवश्यक है यह अपवाद? समाज में महिलाएं और बच्चे ऐतिहासिक रूप से कमज़ोर वर्ग रहे हैं। इनके लिए विशेष कानून बनाना समानता के सिद्धांत का उल्लंघन नहीं बल्कि उसकी वास्तविक प्राप्ति है।
15(3) के तहत बनाए गए कानूनों के उदाहरण:
| कानून/नीति | विवरण |
|---|---|
| मातृत्व लाभ अधिनियम | महिला कर्मचारियों को विशेष लाभ |
| महिला कोटा | पंचायत और नगर निकायों में महिला आरक्षण |
| बाल श्रम निषेध | बच्चों के लिए विशेष संरक्षण |
| शिक्षा का अधिकार | 6-14 वर्ष बच्चों के लिए अनिवार्य शिक्षा |
| POCSO अधिनियम | बच्चों के यौन शोषण के विरुद्ध विशेष कानून |
| महिला-केवल डिब्बे | ट्रेनों में महिलाओं के लिए अलग डिब्बे |
क्या लिंग में थर्ड जेंडर शामिल है? नालसा बनाम भारत संघ (2014) के निर्णय के बाद “लिंग” की व्याख्या में ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को भी शामिल माना जाता है।
अनुच्छेद 15(4) — पिछड़े वर्गों और SC/ST के लिए आरक्षण
यह खंड पहले संशोधन (1951) द्वारा जोड़ा गया था।
पृष्ठभूमि: 1951 में मद्रास राज्य बनाम चम्पकम दोराईराजन मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने आरक्षण नीति को अनुच्छेद 15(1) का उल्लंघन मानकर असंवैधानिक घोषित किया। इस निर्णय के जवाब में संसद ने पहले संविधान संशोधन (1951) द्वारा अनुच्छेद 15(4) जोड़ा।
15(4) के लाभार्थी:
- सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्ग (OBC)
- अनुसूचित जातियाँ (SC)
- अनुसूचित जनजातियाँ (ST)
“पिछड़ेपन” का निर्धारण: पिछड़े वर्गों की पहचान के लिए राज्य और केंद्र सरकारें आयोग बनाती हैं।
- मंडल आयोग (1979) — OBC की पहचान के लिए
- सिन्हो आयोग (2005) — पिछड़े वर्गों की स्थिति के लिए
अनुच्छेद 15(5) — निजी शिक्षण संस्थाओं में भी आरक्षण
यह खंड 93वें संशोधन (2005) द्वारा जोड़ा गया।
महत्व: इस खंड के आने से पहले आरक्षण केवल सरकारी शिक्षण संस्थानों में लागू होता था। 15(5) ने इसे निजी (Private) शिक्षण संस्थाओं (अल्पसंख्यक संस्थाओं को छोड़कर) तक विस्तारित किया।
Inamdar Case (2005): सर्वोच्च न्यायालय ने PA Inamdar बनाम महाराष्ट्र मामले में कहा था कि निजी अल्पसंख्यक संस्थाओं में आरक्षण नहीं लागू होगा। इसके जवाब में 93वाँ संशोधन आया।
अनुच्छेद 15(6) — EWS (आर्थिक रूप से कमज़ोर वर्ग)
यह खंड 103वें संशोधन (2019) द्वारा जोड़ा गया।
उद्देश्य: सामान्य वर्ग के आर्थिक रूप से कमज़ोर (EWS) नागरिकों को 10% आरक्षण देना।
| EWS आरक्षण | विवरण |
|---|---|
| लाभार्थी | सामान्य (अनारक्षित) वर्ग के आर्थिक रूप से कमज़ोर |
| आय सीमा | वार्षिक आय ₹8 लाख से कम |
| कोटा | 10% |
| लागू | सरकारी नौकरी और शिक्षा में |
| संवैधानिक चुनौती | जनहित अभियान बनाम भारत संघ (2022) — सर्वोच्च न्यायालय ने 3:2 से वैध माना |
अनुच्छेद 15 — सारांश तालिका | Summary Table
| खंड | जोड़ा गया | विषय | प्रकृति |
|---|---|---|---|
| 15(1) | मूल संविधान 1950 | राज्य द्वारा भेदभाव निषेध | निषेधात्मक |
| 15(2) | मूल संविधान 1950 | सार्वजनिक स्थलों पर भेदभाव निषेध | निषेधात्मक |
| 15(3) | मूल संविधान 1950 | महिला और बच्चों के लिए विशेष प्रावधान | अनुमतिदायक |
| 15(4) | प्रथम संशोधन 1951 | पिछड़े वर्ग, SC, ST के लिए प्रावधान | अनुमतिदायक |
| 15(5) | 93वाँ संशोधन 2005 | शिक्षण संस्थाओं में आरक्षण | अनुमतिदायक |
| 15(6) | 103वाँ संशोधन 2019 | EWS के लिए 10% आरक्षण | अनुमतिदायक |
ऐतिहासिक न्यायिक निर्णय | Landmark Cases
1. मद्रास राज्य बनाम चम्पकम दोराईराजन (1951)
| विवरण | जानकारी |
|---|---|
| मामला | मद्रास की आरक्षण नीति को चुनौती |
| निर्णय | सर्वोच्च न्यायालय — आरक्षण असंवैधानिक (अनु. 15(1) का उल्लंघन) |
| परिणाम | पहला संशोधन (1951) — अनुच्छेद 15(4) जोड़ा गया |
| महत्व | पहला बड़ा संवैधानिक संशोधन जो न्यायालय के निर्णय के जवाब में आया |
2. इंद्रा साहनी बनाम भारत संघ (1992) — मंडल आयोग केस
| विवरण | जानकारी |
|---|---|
| मामला | OBC को 27% आरक्षण देने को चुनौती |
| निर्णय | 9 न्यायाधीशों की पीठ — OBC आरक्षण वैध |
| 50% सीमा | कुल आरक्षण 50% से अधिक नहीं होना चाहिए (असाधारण परिस्थितियों को छोड़कर) |
| क्रीमी लेयर | OBC में आर्थिक रूप से सशक्त (Creamy Layer) को बाहर करने का आदेश |
| महत्व | आरक्षण न्यायशास्त्र का सबसे महत्वपूर्ण निर्णय |
क्रीमी लेयर (Creamy Layer): वे OBC नागरिक जिनकी वार्षिक आय एक निश्चित सीमा (वर्तमान में ₹8 लाख) से अधिक हो — वे OBC आरक्षण के पात्र नहीं होते।
3. विशाखा बनाम राजस्थान राज्य (1997)
| विवरण | जानकारी |
|---|---|
| मामला | कार्यस्थल पर महिलाओं के यौन उत्पीड़न को रोकने के लिए दिशानिर्देश |
| आधार | अनुच्छेद 15(3) सहित मौलिक अधिकार |
| परिणाम | विशाखा दिशानिर्देश — बाद में POSH Act 2013 बना |
4. नालसा बनाम भारत संघ (2014)
| विवरण | जानकारी |
|---|---|
| मामला | ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के अधिकार |
| निर्णय | ट्रांसजेंडर तीसरे लिंग के रूप में मान्य |
| आधार | अनुच्छेद 14, 15, 19, 21 |
| महत्व | “लिंग” की व्याख्या विस्तृत हुई |
5. नवतेज सिंह जौहर बनाम भारत संघ (2018)
| विवरण | जानकारी |
|---|---|
| मामला | धारा 377 — समलैंगिकता का अपराधीकरण |
| निर्णय | सर्वसम्मति से धारा 377 (सहमति वयस्कों के बीच) असंवैधानिक |
| आधार | अनुच्छेद 14, 15, 19, 21 |
| महत्व | “यौन अभिविन्यास” को “लिंग” की व्याख्या में शामिल किया |
6. जनहित अभियान बनाम भारत संघ (2022)
| विवरण | जानकारी |
|---|---|
| मामला | 103वाँ संशोधन — EWS 10% आरक्षण को चुनौती |
| निर्णय | 3:2 बहुमत — 103वाँ संशोधन वैध |
| महत्व | आर्थिक आधार पर आरक्षण को वैध माना गया |
| असहमति | 2 न्यायाधीश असहमत — इंद्रा साहनी की 50% सीमा का उल्लंघन |
अनुच्छेद 15 बनाम अनुच्छेद 16 | Article 15 vs Article 16
अनुच्छेद 15 और 16 दोनों भेदभाव के निषेध से संबंधित हैं, लेकिन इनमें अंतर है:
| पहलू | अनुच्छेद 15 | अनुच्छेद 16 |
|---|---|---|
| विषय | सामान्य भेदभाव निषेध | सार्वजनिक रोज़गार में भेदभाव निषेध |
| क्षेत्र | व्यापक | केवल सरकारी/सार्वजनिक रोज़गार |
| “जन्मस्थान” | निषिद्ध आधार | निषिद्ध आधार (विशेष अपवाद के साथ) |
| “निवास” | नहीं | अनुच्छेद 16(3) में विशेष परिस्थिति |
| आरक्षण | 15(4), 15(5), 15(6) | 16(4), 16(4A), 16(4B) |
अनुच्छेद 15 का व्यावहारिक प्रभाव | Practical Impact
क्या होता अगर अनुच्छेद 15 न होता?
दैनिक जीवन में उदाहरण:
| परिस्थिति | अनुच्छेद 15 के बिना | अनुच्छेद 15 के साथ |
|---|---|---|
| मंदिर में दलित | प्रवेश निषेध हो सकता था | कानूनी अधिकार |
| होटल में मुस्लिम | कमरा देने से इनकार | भेदभाव अवैध |
| लड़की को शिक्षा | सरकारी स्कूल में भेद | अनुच्छेद 15(3) की सुरक्षा |
| OBC छात्र — IIT | सीट नहीं मिलती | 27% OBC आरक्षण |
| SC/ST नागरिक — नौकरी | कोई विशेष सुरक्षा नहीं | 15% SC + 7.5% ST आरक्षण |
आरक्षण का वर्तमान प्रारूप
| वर्ग | आरक्षण | आधार |
|---|---|---|
| SC | 15% | अनु. 15(4) + 16(4) |
| ST | 7.5% | अनु. 15(4) + 16(4) |
| OBC | 27% | अनु. 15(4) + 16(4) |
| EWS | 10% | अनु. 15(6) + 16(6) |
| कुल | 59.5% | |
| सामान्य वर्ग | 40.5% |
आलोचना और चुनौतियाँ | Criticism and Challenges
अनुच्छेद 15 और उसके तहत आरक्षण नीति पर कई दृष्टिकोण से आलोचना होती है:
आरक्षण के पक्ष में तर्क
| तर्क | विवरण |
|---|---|
| ऐतिहासिक अन्याय | सदियों के भेदभाव का प्रायश्चित |
| सामाजिक न्याय | समाज में विविधता सुनिश्चित करना |
| प्रतिनिधित्व | संस्थाओं में सभी वर्गों की भागीदारी |
| सक्षमता का मिथक | मेरिट की अवधारणा खुद जाति से प्रभावित |
आरक्षण के विपक्ष में तर्क
| तर्क | विवरण |
|---|---|
| योग्यता की अनदेखी | सर्वश्रेष्ठ को अवसर नहीं |
| 50% की सीमा | इंद्रा साहनी — 50% से अधिक नहीं होना चाहिए |
| क्रीमी लेयर | सम्पन्न OBC भी लाभ उठाते हैं |
| जाति की निरंतरता | आरक्षण जाति को और मज़बूत करता है |
| EWS विवाद | आर्थिक मानदंड पर्याप्त नहीं |
अनुच्छेद 15 और अन्य मौलिक अधिकारों का संबंध | Relation with Other Fundamental Rights
| अनुच्छेद | संबंध |
|---|---|
| अनु. 14 | कानून के समक्ष समानता — 15 का पूरक |
| अनु. 16 | रोज़गार में भेदभाव निषेध — 15 का विशेष रूप |
| अनु. 17 | अस्पृश्यता उन्मूलन — 15(2) का सामाजिक विस्तार |
| अनु. 19(1)(g) | व्यवसाय की स्वतंत्रता — 15(5) से संबंध |
| अनु. 21 | जीवन का अधिकार — 15 के उल्लंघन से प्रभावित |
| अनु. 29(2) | शैक्षणिक संस्थाओं में भेदभाव निषेध — 15 से जुड़ा |
| अनु. 46 | DPSP — पिछड़े वर्गों की उन्नति, 15(4) का समर्थन |
परीक्षा उपयोगी तथ्य | Key Facts for UPSC/SSC
| प्रश्न | उत्तर |
|---|---|
| अनुच्छेद 15 का शीर्षक | भेदभाव का प्रतिषेध |
| कितने खंड | 6 (15(1) से 15(6)) |
| मूल खंड | 15(1) और 15(2) |
| 15(4) कब जोड़ा | प्रथम संशोधन 1951 |
| 15(5) कब जोड़ा | 93वाँ संशोधन 2005 |
| 15(6) कब जोड़ा | 103वाँ संशोधन 2019 |
| भेदभाव के 5 आधार | धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग, जन्मस्थान |
| 15(2) लागू होता है | सभी नागरिकों पर (केवल राज्य पर नहीं) |
| 15(3) किनके लिए | महिला और बच्चे |
| 15(4) किनके लिए | SC, ST, OBC |
| 15(6) किनके लिए | EWS (सामान्य वर्ग, आय ₹8 लाख से कम) |
| चम्पकम केस | 1951 — 15(4) का कारण |
| इंद्रा साहनी | 1992 — 50% सीमा |
| क्रीमी लेयर | OBC में आर्थिक रूप से सशक्त |
| नालसा केस | 2014 — ट्रांसजेंडर अधिकार |
| EWS कोटा | 10% — 103वाँ संशोधन |
महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर | FAQs
प्र. अनुच्छेद 15 क्या है?
उ. अनुच्छेद 15 भारतीय संविधान का वह मौलिक अधिकार है जो धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग या जन्मस्थान के आधार पर भेदभाव का निषेध करता है। साथ ही यह महिलाओं, बच्चों, SC/ST और पिछड़े वर्गों के लिए विशेष प्रावधानों की अनुमति देता है।
प्र. अनुच्छेद 15 में कितने खंड हैं?
उ. 6 खंड — 15(1) से 15(6)। मूल संविधान में 15(1) और 15(2) थे। बाद में 15(3), 15(4), 15(5) और 15(6) जोड़े गए।
प्र. अनुच्छेद 15(4) क्यों जोड़ा गया?
उ. 1951 में सर्वोच्च न्यायालय ने चम्पकम दोराईराजन मामले में आरक्षण नीति को असंवैधानिक माना। इस निर्णय के जवाब में संसद ने पहले संशोधन द्वारा 15(4) जोड़कर पिछड़े वर्गों, SC और ST के लिए विशेष प्रावधान की संवैधानिक अनुमति दी।
प्र. EWS आरक्षण क्या है और इसका संवैधानिक आधार क्या है?
उ. EWS (Economically Weaker Section) आरक्षण 103वें संशोधन (2019) द्वारा अनुच्छेद 15(6) और 16(6) जोड़कर दिया गया। सामान्य वर्ग के वे नागरिक जिनकी वार्षिक आय ₹8 लाख से कम हो, उन्हें सरकारी नौकरी और शिक्षा में 10% आरक्षण मिलता है। 2022 में सर्वोच्च न्यायालय ने इसे 3:2 से वैध माना।
प्र. अनुच्छेद 15 और 16 में क्या अंतर है?
उ. अनुच्छेद 15 सामान्य भेदभाव निषेध का व्यापक प्रावधान है जो सार्वजनिक स्थलों सहित सभी क्षेत्रों में लागू होता है। अनुच्छेद 16 विशेष रूप से सार्वजनिक रोज़गार (सरकारी नौकरी) में भेदभाव निषेध से संबंधित है।
प्र. क्या अनुच्छेद 15 निजी व्यक्तियों पर भी लागू होता है?
उ. 15(1) केवल “राज्य” पर लागू होता है। लेकिन 15(2) सभी नागरिकों पर लागू होता है — यानी कोई भी निजी व्यक्ति सार्वजनिक स्थलों (होटल, दुकान, कुएं आदि) पर धर्म, जाति, लिंग आदि के आधार पर भेदभाव नहीं कर सकता।
अनुच्छेद 15 केवल संविधान की एक धारा नहीं है — यह उस भारत का सपना है जो डॉ. अम्बेडकर, नेहरू, गांधी और हमारे सभी संविधान निर्माताओं ने देखा था।
एक ऐसा भारत जहाँ किसी को उसके जन्म के कारण — उसकी जाति के कारण, उसके धर्म के कारण, उसके लिंग के कारण — हीन न समझा जाए।
यह अनुच्छेद दोहरी भूमिका निभाता है — एक तरफ यह भेदभाव का कठोर निषेध करता है, दूसरी तरफ यह स्वीकार करता है कि समानता केवल कागज़ पर लिखने से नहीं आती — उसके लिए उन्हें ऊपर उठाना होगा जो सदियों से नीचे दबाए गए हैं।
“Equality does not mean treating everyone the same — it means treating everyone according to their needs.” (समानता का अर्थ सबके साथ एक जैसा व्यवहार करना नहीं — बल्कि सबकी ज़रूरत के अनुसार व्यवहार करना है।)
अनुच्छेद 15 इसी दर्शन की संवैधानिक अभिव्यक्ति है।





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