पल्लव वंश — दक्षिण भारत के इतिहास का वह स्वर्णिम अध्याय जिसने न केवल एक शक्तिशाली साम्राज्य स्थापित किया, बल्कि भारतीय कला, स्थापत्य और संस्कृति को एक ऐसी दिशा दी जिसकी छाप आज भी महाबलीपुरम की पाषाण शिलाओं पर, कांचीपुरम के मंदिरों में और दक्षिण-पूर्व एशिया की सभ्यताओं पर दिखती है।
तमिलनाडु की धरती पर पले-बढ़े पल्लव शासकों ने द्रविड़ वास्तुकला शैली को जन्म दिया — वह शैली जो आज भी भारत के दक्षिणी मंदिरों की पहचान है।
इस लेख में हम पल्लव वंश के उद्भव, प्रमुख शासकों, साम्राज्य विस्तार, कला-संस्कृति के योगदान और पतन की विस्तृत जानकारी देंगे।
एक नज़र में पल्लव वंश | Quick Facts: Pallava Dynasty
| विषय | विवरण |
|---|---|
| काल | लगभग तीसरी शताब्दी ईस्वी से नौवीं शताब्दी ईस्वी |
| राजधानी | कांचीपुरम (Kanchipuram) |
| प्रमुख क्षेत्र | तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश का कुछ भाग |
| धर्म | शैव हिंदू धर्म (मुख्यतः) |
| भाषा | संस्कृत, तमिल, प्राकृत |
| प्रमुख शासक | महेंद्रवर्मन I, नरसिंहवर्मन I (मामल्ल) |
| वास्तुकला | द्रविड़ शैली के जन्मदाता |
| प्रमुख स्मारक | महाबलीपुरम, कांचीपुरम |
| पतन | राष्ट्रकूट और चोल वंश द्वारा |
| उत्तराधिकारी | चोल वंश |
पल्लव वंश का उद्भव और उत्पत्ति | Origin of Pallava Dynasty
पल्लव वंश की उत्पत्ति के बारे में इतिहासकारों में मतभेद है। विभिन्न मत इस प्रकार हैं:
उत्पत्ति के प्रमुख मत
| मत | समर्थक | विवरण |
|---|---|---|
| ब्राह्मण मत | कुछ शिलालेख | पल्लव ब्राह्मण कुल से थे जो बाद में क्षत्रिय बन गए |
| नाग वंश मत | कुछ इतिहासकार | नाग राजकुमारी और ब्राह्मण की संतान |
| पार्थियन मत | विदेशी विद्वान | “पल्लव” = पार्थियन (Parthian) — विदेशी मूल |
| आंध्र सातवाहन मत | अधिकांश इतिहासकार | सातवाहन वंश के सामंत जो बाद में स्वतंत्र हो गए |
अधिकांश आधुनिक इतिहासकार मानते हैं कि पल्लव मूलतः सातवाहन साम्राज्य के सामंत थे जिन्होंने सातवाहनों के पतन (तीसरी शताब्दी ईस्वी) के बाद स्वतंत्र सत्ता स्थापित की।
“पल्लव” शब्द संस्कृत में “पल्लव” (पत्ता/अंकुर) से आया हो सकता है, या तमिल शब्द से।
प्रारंभिक पल्लव
पल्लव वंश के प्रारंभिक शासकों के बारे में जानकारी सीमित है। इनके शिलालेख प्राकृत और संस्कृत में मिलते हैं।
प्रारंभिक महत्वपूर्ण शासक:
- सिंहवर्मन I — प्रारंभिक पल्लव शासक
- शिवस्कंदवर्मन — पल्लव वंश का पहला महत्वपूर्ण राजा जिसके शिलालेख मिले हैं
पल्लव वंश की राजधानी: कांचीपुरम | Capital: Kanchipuram
कांचीपुरम — पल्लव वंश की राजधानी और दक्षिण भारत का सांस्कृतिक-धार्मिक केंद्र।
| विवरण | जानकारी |
|---|---|
| प्राचीन नाम | काँची, कांचीपुरम |
| स्थान | तमिलनाडु (चेन्नई से 72 किमी) |
| उपनाम | “सात पगोडा का शहर”, “दक्षिण की काशी” |
| धार्मिक महत्व | हिंदुओं के सात पवित्र नगरों में से एक |
| प्रमुख मंदिर | कैलासनाथ मंदिर, एकाम्बरनाथ मंदिर |
| विशेषता | रेशम साड़ियों के लिए आज भी प्रसिद्ध |
कांचीपुरम पल्लव काल में न केवल राजनीतिक बल्कि शिक्षा, धर्म और व्यापार का भी महत्वपूर्ण केंद्र था। यहाँ बौद्ध, जैन और हिंदू — तीनों धर्मों के अनुयायी रहते थे।
पल्लव वंश के प्रमुख शासक | Major Rulers of Pallava Dynasty
1. सिंहविष्णु (575–600 ईस्वी) — पल्लव शक्ति का उदय
सिंहविष्णु को पल्लव वंश का वास्तविक संस्थापक माना जाता है जिसने वंश को शक्तिशाली बनाया।
- उपाधि: “अवनिसिंह” (पृथ्वी का सिंह)
- कलभ्र वंश को पराजित कर तमिल क्षेत्र पर अधिकार किया
- वैष्णव धर्म का अनुयायी था
- प्रसिद्ध तमिल कवि भारवि उसके दरबार में थे
- इसके काल में पल्लव साम्राज्य का विस्तार हुआ
2. महेंद्रवर्मन I (600–630 ईस्वी) — बहुमुखी प्रतिभा के धनी
महेंद्रवर्मन I पल्लव वंश के सबसे बहुमुखी प्रतिभाशाली शासकों में से एक थे।
| पहलू | विवरण |
|---|---|
| उपाधियाँ | मत्तविलास, विचित्रचित्त, गुणभर |
| धर्म परिवर्तन | पहले जैन, फिर शैव हिंदू बने |
| नाट्य रचना | “मत्तविलास प्रहसन” — संस्कृत प्रहसन के रचयिता |
| वास्तुकला | रॉक-कट मंदिरों के प्रणेता |
| संगीत | संगीत विशारद, “कुडुमियामलाई शिलालेख” में संगीत ज्ञान |
| चित्रकला | “चित्रकारपुली” (चित्रों का बाघ) की उपाधि |
मत्तविलास प्रहसन — यह संस्कृत का एक प्रसिद्ध व्यंग्य नाटक है जिसमें कपालिक, बौद्ध और पाशुपत सन्यासियों का मज़ाकिया चित्रण है। यह आज भी भारतीय साहित्य की अमूल्य निधि है।
महेंद्रवर्मन का पल्लव-चालुक्य संघर्ष से सामना हुआ। चालुक्य राजा पुलकेशिन II ने उत्तरी क्षेत्र छीन लिए।
3. नरसिंहवर्मन I — मामल्ल (630–668 ईस्वी) — पल्लव शक्ति का शिखर
नरसिंहवर्मन I पल्लव वंश के सबसे शक्तिशाली और महान शासक थे।
| विवरण | जानकारी |
|---|---|
| उपाधि | “मामल्ल” (महान पहलवान) |
| महाबलीपुरम | इनके नाम पर “मामल्लपुरम” = महाबलीपुरम |
| सबसे बड़ी उपलब्धि | चालुक्य राजा पुलकेशिन II को तीन बार पराजित किया |
| वातापी विजय | चालुक्यों की राजधानी वातापी (बादामी) पर कब्ज़ा |
| उपाधि | “वातापीकोंड” (वातापी का विजेता) |
| श्रीलंका | श्रीलंका की राजनीति में हस्तक्षेप |
| वास्तुकला | महाबलीपुरम के रथ मंदिर और गुफा मंदिर |
पुलकेशिन II की पराजय इतिहास की एक महत्वपूर्ण घटना थी। पुलकेशिन II — जिसने हर्षवर्धन को भी रोका था — मामल्ल से तीन युद्धों में हारा और अंततः मारा गया।
नरसिंहवर्मन I के दरबार में ह्वेनसांग (Xuanzang) आया था जो चीनी यात्री था। उसने कांचीपुरम और पल्लव साम्राज्य का विवरण अपने यात्रा वृत्तांत में दिया है।
4. नरसिंहवर्मन II — राजसिंह (695–728 ईस्वी) — निर्माता राजा
| विवरण | जानकारी |
|---|---|
| उपाधि | राजसिंह, आगमप्रिय |
| कैलासनाथ मंदिर | कांचीपुरम का प्रसिद्ध कैलासनाथ मंदिर बनवाया |
| शोर मंदिर | महाबलीपुरम का प्रसिद्ध Shore Temple |
| धर्म | उत्साही शैव |
| साहित्य | “अवनिसिंह पल्लवमल्ल” की उपाधि |
5. दंतिवर्मन (796–847 ईस्वी)
पल्लव वंश के अंतिम महत्वपूर्ण शासकों में से एक। इनके काल में राष्ट्रकूट और चोल शक्ति बढ़ने लगी थी।
पल्लव शासकों की कालक्रम सूची
| शासक | काल (लगभग) | महत्वपूर्ण कार्य |
|---|---|---|
| सिंहविष्णु | 575–600 ई. | पल्लव शक्ति का उदय, कलभ्र पराजय |
| महेंद्रवर्मन I | 600–630 ई. | रॉक-कट मंदिर, मत्तविलास प्रहसन |
| नरसिंहवर्मन I | 630–668 ई. | वातापी विजय, महाबलीपुरम |
| महेंद्रवर्मन II | 668–672 ई. | अल्पकालीन शासन |
| परमेश्वरवर्मन I | 672–700 ई. | चालुक्यों से संघर्ष |
| नरसिंहवर्मन II | 700–728 ई. | कैलासनाथ मंदिर, Shore Temple |
| परमेश्वरवर्मन II | 728–731 ई. | राष्ट्रकूट आक्रमण |
| नंदिवर्मन II | 731–796 ई. | वैकुंठपेरुमल मंदिर |
| दंतिवर्मन | 796–847 ई. | अंतिम महत्वपूर्ण शासक |
| नंदिवर्मन III | 847–869 ई. | पल्लव शक्ति का ह्रास |
पल्लव-चालुक्य संघर्ष | Pallava-Chalukya Conflict
पल्लव और चालुक्य वंश के बीच दशकों तक चला संघर्ष दक्षिण भारत के इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण प्रतिद्वंद्विता थी।
| युद्ध / घटना | पल्लव | चालुक्य | परिणाम |
|---|---|---|---|
| प्रथम संघर्ष (610 ई.) | महेंद्रवर्मन I | पुलकेशिन II | पल्लव की पराजय |
| पुल्लालूर युद्ध (618 ई.) | महेंद्रवर्मन I | पुलकेशिन II | पल्लव जीते |
| वातापी युद्ध (642 ई.) | नरसिंहवर्मन I | पुलकेशिन II | पल्लव की निर्णायक जीत, पुलकेशिन मारा गया |
| बाद के युद्ध | परमेश्वरवर्मन I | विक्रमादित्य I | मिश्रित परिणाम |
वातापी विजय (642 ई.) — यह पल्लव इतिहास की सर्वोच्च सैन्य उपलब्धि थी। नरसिंहवर्मन I ने न केवल चालुक्यों की राजधानी पर कब्ज़ा किया बल्कि “वातापीकोंड” की उपाधि धारण की।
पल्लव वंश की कला और वास्तुकला | Art and Architecture
पल्लव वंश का सबसे अमर योगदान उनकी कला और वास्तुकला है। इन्होंने द्रविड़ स्थापत्य शैली का विकास किया जो आज भी दक्षिण भारत के मंदिरों में जीवित है।
पल्लव वास्तुकला के चरण
पल्लव वास्तुकला को चार प्रमुख चरणों में बाँटा जाता है:
| चरण | काल | प्रकार | उदाहरण |
|---|---|---|---|
| महेंद्र शैली | 600–630 ई. | रॉक-कट गुफा मंदिर | मंडगपट्टु, महाबलीपुरम गुफाएँ |
| मामल्ल शैली | 630–668 ई. | रथ मंदिर (एकाश्म) | पंचपांडव रथ |
| राजसिंह शैली | 695–728 ई. | संरचनात्मक मंदिर | कैलासनाथ, Shore Temple |
| नंदिवर्मन शैली | 731–900 ई. | संरचनात्मक मंदिर | वैकुंठपेरुमल मंदिर |
महाबलीपुरम (मामल्लपुरम) — UNESCO विश्व धरोहर
महाबलीपुरम — चेन्नई से 60 किमी दूर बंगाल की खाड़ी के तट पर स्थित यह स्थान पल्लव कला का सबसे बड़ा खजाना है।
1984 में UNESCO ने इसे विश्व धरोहर स्थल घोषित किया।
प्रमुख स्मारक:
1. पंचपांडव रथ (Pancha Pandava Rathas)
- पाँच एकाश्म (Monolithic) रथ-मंदिर
- ग्रेनाइट की एक ही चट्टान को काटकर बनाए गए
- नाम: धर्मराज, भीम, अर्जुन, नकुल-सहदेव और द्रौपदी रथ
- नरसिंहवर्मन I के काल में बने
- दक्षिण भारतीय मंदिर स्थापत्य के आरंभिक उदाहरण
2. अर्जुन की तपस्या / गंगावतरण (Arjuna’s Penance)
- विश्व की सबसे बड़ी खुली चट्टान की नक्काशी
- 27 मीटर लंबी और 9 मीटर ऊँची
- गंगा का पृथ्वी पर अवतरण या अर्जुन की तपस्या — दो व्याख्याएँ
- सैकड़ों देव, मानव और पशु आकृतियाँ
3. शोर मंदिर (Shore Temple)
- समुद्र तट पर निर्मित — इसीलिए “Shore Temple”
- नरसिंहवर्मन II (राजसिंह) द्वारा निर्मित
- भगवान विष्णु और शिव — दोनों को समर्पित
- संरचनात्मक मंदिर निर्माण का प्रारंभिक उदाहरण
4. महिषासुरमर्दिनी गुफा
- महिषासुर का वध करती दुर्गा की अद्भुत मूर्ति
- विष्णु का शयन और गंगावतरण — तीन प्रमुख पैनल
5. कृष्ण का मक्खन गोला (Krishna’s Butter Ball)
- विशाल ग्रेनाइट बोल्डर जो ढलान पर टिका है
- भौतिकी के नियमों को चुनौती देता प्रतीत होता है
कांचीपुरम के मंदिर
1. कैलासनाथ मंदिर (Kailasanatha Temple)
| विवरण | जानकारी |
|---|---|
| निर्माता | नरसिंहवर्मन II (राजसिंह) |
| काल | 700–728 ईस्वी |
| समर्पित | भगवान शिव |
| विशेषता | कांचीपुरम का सबसे पुराना मंदिर |
| शैली | द्रविड़ वास्तुकला का उत्कृष्ट उदाहरण |
| महत्व | राष्ट्रकूट राजा राष्ट्रकूट कृष्ण I ने एलोरा का कैलास मंदिर इससे प्रेरणा लेकर बनवाया |
2. वैकुंठपेरुमल मंदिर
- नंदिवर्मन II द्वारा निर्मित
- तीन मंज़िला — भूतल पर विष्णु की तीन मुद्राओं में प्रतिमाएँ
- दीवारों पर पल्लव इतिहास के दृश्य
पल्लव वास्तुकला की विशेषताएँ
| विशेषता | विवरण |
|---|---|
| विमान (Vimana) | पिरामिड आकार का मंदिर शिखर |
| मंडप | स्तंभों वाला हॉल |
| गोपुरम | प्रवेश द्वार का टॉवर (पल्लव काल में छोटा) |
| सिंह-स्तंभ | शेर के आकार के स्तंभ आधार |
| नंदी | मंदिर के सामने नंदी की प्रतिमा |
| एकाश्म | चट्टान काटकर बनाना |
पल्लव काल में धर्म और दर्शन | Religion and Philosophy
शैव धर्म और भक्ति आंदोलन
पल्लव काल में भक्ति आंदोलन का उदय हुआ। नायनमार (शैव संत) और अलवार (वैष्णव संत) इसी काल में हुए।
प्रमुख नायनमार संत:
- अप्पर (तिरुनावुक्करसर) — महेंद्रवर्मन I को जैन से शैव बनाने में इनकी भूमिका
- तिरुज्ञानसंबंधर — महान शैव संत-कवि
- सुंदरमूर्ति — भक्ति पदों के रचयिता
बौद्ध और जैन धर्म
कांचीपुरम बौद्ध शिक्षा का भी केंद्र था। महान बौद्ध दार्शनिक धर्मपाल और दिग्नाग कांचीपुरम से जुड़े थे।
पल्लव काल में साहित्य और शिक्षा | Literature and Education
संस्कृत साहित्य
पल्लव दरबार संस्कृत साहित्य का केंद्र था।
| रचना | रचयिता | विवरण |
|---|---|---|
| मत्तविलास प्रहसन | महेंद्रवर्मन I | संस्कृत प्रहसन |
| भारविकृत किरातार्जुनीयम | भारवि (सिंहविष्णु के दरबारी) | संस्कृत महाकाव्य |
| दंडिन का दशकुमारचरित | दंडिन (पल्लव दरबारी) | संस्कृत गद्य काव्य |
तमिल साहित्य
पल्लव काल में तमिल साहित्य भी फला-फूला। भक्ति संतों के तमिल भजन इसी काल में रचे गए।
शिक्षा
कांचीपुरम एक बड़ा शिक्षा केंद्र था जहाँ हिंदू, बौद्ध और जैन — सभी के लिए शिक्षण संस्थान थे।
पल्लव वंश और दक्षिण-पूर्व एशिया | Pallavas and Southeast Asia
पल्लव वंश का प्रभाव भारत की सीमाओं से बहुत आगे तक गया।
पल्लव लिपि का प्रसार
पल्लव-ग्रंथ लिपि से ही दक्षिण-पूर्व एशिया की अधिकांश लिपियाँ विकसित हुईं:
| देश | लिपि | मूल |
|---|---|---|
| थाईलैंड | थाई लिपि | पल्लव-ग्रंथ से |
| कंबोडिया | खमेर लिपि | पल्लव-ग्रंथ से |
| म्यांमार | बर्मी लिपि | पल्लव-ग्रंथ से |
| इंडोनेशिया | जावाई/बाली लिपि | पल्लव-ग्रंथ से |
| मलेशिया | पुरानी मलाय लिपि | पल्लव प्रभाव |
सांस्कृतिक प्रसार
पल्लव व्यापारियों और पुजारियों ने दक्षिण-पूर्व एशिया में हिंदू-बौद्ध संस्कृति फैलाई। कंबोडिया के अंकोरवाट और इंडोनेशिया के प्रम्बानन मंदिरों पर पल्लव स्थापत्य का स्पष्ट प्रभाव दिखता है।
पल्लव वंश का पतन | Decline of Pallava Dynasty
पल्लव वंश के पतन के कई कारण थे:
1. राष्ट्रकूट आक्रमण
राष्ट्रकूट राजा दंतिदुर्ग और बाद में कृष्ण I ने पल्लवों को बड़ी क्षति पहुँचाई।
2. गंग वंश से संघर्ष
पश्चिमी गंग वंश से लगातार संघर्ष ने पल्लवों को कमज़ोर किया।
3. चोल वंश का उदय
नौवीं शताब्दी में विजयालय चोल ने शक्ति बढ़ाई। 897 ईस्वी में चोल राजा आदित्य I ने अंतिम पल्लव राजा अपराजित को पराजित किया।
4. आंतरिक कमज़ोरी
उत्तराधिकार विवाद और आंतरिक कलह ने भी पल्लव वंश को कमज़ोर किया।
| कारण | विवरण |
|---|---|
| राष्ट्रकूट आक्रमण | उत्तर से निरंतर दबाव |
| चोल उदय | दक्षिण में नई शक्ति |
| गंग संघर्ष | पश्चिम में युद्ध |
| आंतरिक विद्रोह | उत्तराधिकार विवाद |
897 ईस्वी में पल्लव वंश का अंत हुआ और चोल वंश दक्षिण भारत की प्रमुख शक्ति बन गया।
पल्लव वंश का महत्व और योगदान | Legacy of Pallava Dynasty
पल्लव वंश का भारतीय इतिहास और संस्कृति में योगदान अतुलनीय है:
1. द्रविड़ वास्तुकला: पल्लवों ने द्रविड़ स्थापत्य शैली का आधार रखा जो चोल, विजयनगर और नायक काल में और विकसित हुई।
2. भक्ति आंदोलन: पल्लव काल में नायनमार और अलवार संतों का उदय हुआ जिन्होंने भक्ति आंदोलन की नींव रखी।
3. लिपि प्रसार: पल्लव-ग्रंथ लिपि से दक्षिण-पूर्व एशिया की अनेक लिपियाँ विकसित हुईं।
4. साहित्य: संस्कृत और तमिल दोनों साहित्यों को पल्लव दरबार ने समृद्ध किया।
5. सांस्कृतिक प्रसार: पल्लव व्यापारियों ने भारतीय संस्कृति को दक्षिण-पूर्व एशिया तक फैलाया।
पल्लव वंश — परीक्षा उपयोगी तथ्य | Important Facts for Exams
| प्रश्न | उत्तर |
|---|---|
| पल्लव वंश की राजधानी | कांचीपुरम |
| “मामल्ल” उपाधि किसकी थी? | नरसिंहवर्मन I |
| “वातापीकोंड” किसे कहते हैं? | नरसिंहवर्मन I (वातापी जीतने पर) |
| कैलासनाथ मंदिर किसने बनवाया? | नरसिंहवर्मन II (राजसिंह) |
| Shore Temple कहाँ है? | महाबलीपुरम |
| पंचपांडव रथ किसने बनवाए? | नरसिंहवर्मन I |
| मत्तविलास प्रहसन के रचयिता | महेंद्रवर्मन I |
| पल्लव वंश का अंत कब? | 897 ईस्वी (आदित्य चोल द्वारा) |
| UNESCO धरोहर पल्लव स्थल | महाबलीपुरम (1984) |
| “चित्रकारपुली” उपाधि किसकी? | महेंद्रवर्मन I |
महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर | FAQs
प्र. पल्लव वंश की स्थापना किसने की?
उ. पल्लव वंश के वास्तविक संस्थापक के बारे में मतभेद है। सिंहविष्णु (575 ई.) को पल्लव वंश को शक्तिशाली बनाने का श्रेय दिया जाता है।
प्र. पल्लव वंश का सबसे महान शासक कौन था?
उ. नरसिंहवर्मन I “मामल्ल” — जिन्होंने चालुक्य राजा पुलकेशिन II को पराजित किया और वातापी पर विजय प्राप्त की।
प्र. महाबलीपुरम का पुराना नाम क्या था?
उ. मामल्लपुरम — नरसिंहवर्मन I (मामल्ल) के नाम पर।
प्र. पल्लव वंश ने किस वास्तुकला शैली को जन्म दिया?
उ. द्रविड़ वास्तुकला शैली — जिसकी विशेषता पिरामिड आकार का विमान और सिंह-स्तंभ हैं।
प्र. पल्लव वंश का अंत कैसे हुआ?
उ. 897 ईस्वी में चोल राजा आदित्य I ने अंतिम पल्लव राजा अपराजित को पराजित किया और पल्लव साम्राज्य का अंत हुआ।
प्र. पल्लव लिपि का क्या महत्व है?
उ. पल्लव-ग्रंथ लिपि से थाई, खमेर, बर्मी और जावाई सहित दक्षिण-पूर्व एशिया की अनेक लिपियाँ विकसित हुईं।
पल्लव वंश की कहानी केवल राजाओं और युद्धों की कहानी नहीं है — यह पत्थरों में उकेरी गई उस सभ्यता की कहानी है जिसने भारतीय कला और संस्कृति को एक नई ऊँचाई दी।
जब आप महाबलीपुरम के रथ मंदिरों को देखते हैं या कांचीपुरम के कैलासनाथ मंदिर की नक्काशी को निहारते हैं — तो आप पल्लव वंश की उस अमर विरासत को छू रहे होते हैं जो डेढ़ हज़ार साल बाद भी उतनी ही जीवंत और भव्य है।
महेंद्रवर्मन की कलम, मामल्ल की तलवार और राजसिंह का छेनी — तीनों मिलकर पल्लव वंश की वह अमर कहानी लिखते हैं जो पत्थरों पर उकेरी गई है और जो कभी मिटेगी नहीं।
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