भारत के स्वतंत्रता संग्राम की कहानी 1857 से नहीं शुरू होती।
इससे पहले — बहुत पहले — जब अंग्रेज़ी साम्राज्य अभी अपनी जड़ें जमा रहा था, तब भारत के जंगलों और पहाड़ियों में रहने वाले आदिवासी लोगों ने उस साम्राज्य की नींव हिला दी थी।
कोल विद्रोह (Kol Rebellion) — 1831-32 — ऐसा ही एक विद्रोह था।
झारखंड की छोटानागपुर पहाड़ियों में रहने वाले कोल जनजाति के लोगों ने अंग्रेज़ों की शोषणकारी नीतियों, ज़मींदारों के अत्याचार और अपनी भूमि छिनने के विरुद्ध हथियार उठाए।
यह विद्रोह इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह 1857 के विद्रोह से 26 साल पहले हुआ — और इसने भारत में आदिवासी प्रतिरोध की एक परंपरा स्थापित की जो संथाल हूल (1855), बिरसा मुंडा आंदोलन (1899) तक चली।
मुख्य तथ्य एक नज़र में | Key Facts at a Glance
| विषय | विवरण |
|---|---|
| विद्रोह का नाम | कोल विद्रोह (Kol Rebellion / Kol Uprising) |
| काल | 1831–1832 |
| क्षेत्र | छोटानागपुर, सिंहभूम, पलामू, मानभूम |
| वर्तमान राज्य | झारखंड, ओडिशा, पश्चिम बंगाल |
| प्रमुख जनजातियाँ | कोल, मुंडा, हो, ओरांव, भूमिज |
| प्रमुख नेता | बुद्धो भगत, सुई मुंडा, जोआ भगत, झिंदराई मानकी |
| विरुद्ध | ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी, ज़मींदार, महाजन |
| दमन | ब्रिटिश सेना द्वारा — 1832 में |
| महत्व | भारत के प्रारंभिक आदिवासी विद्रोहों में सबसे बड़ा |
कोल जनजाति — कौन थे ये लोग? | Who Were the Kols?
परिचय:
“कोल” एक सामूहिक नाम है जो छोटानागपुर क्षेत्र की कई आदिवासी जनजातियों के लिए प्रयोग होता था — मुख्यतः मुंडा, हो, ओरांव (कुडुख), भूमिज और कुछ अन्य।
ये लोग सदियों से छोटानागपुर के घने जंगलों और पहाड़ियों में रहते आए थे।
कोल समाज की विशेषताएँ:
| विशेषता | विवरण |
|---|---|
| निवास | छोटानागपुर की पहाड़ियाँ और जंगल |
| जीविका | वन उत्पाद, कृषि, शिकार |
| भूमि व्यवस्था | “खुँटकट्टी” — सामूहिक भूमि स्वामित्व |
| सामाजिक ढाँचा | कुल/गोत्र आधारित — “मानकी-मुंडा” व्यवस्था |
| धर्म | प्रकृति पूजा — सरना धर्म |
| भाषा | मुंडारी, हो, कुडुख |
| शासन | ग्राम पंचायत — “मानकी” (ग्राम प्रमुख) |
खुँटकट्टी व्यवस्था — उनकी आत्मा:
“खुँटकट्टी” कोल/मुंडा जनजाति की भूमि-स्वामित्व की पारंपरिक व्यवस्था थी।
इसके अनुसार जिस परिवार ने पहली बार जंगल काटकर ज़मीन बनाई — वह उस ज़मीन का स्थायी मालिक था। इस अधिकार को “भूइहरी” भी कहते थे।
यह भूमि बेची या हस्तांतरित नहीं की जा सकती थी — यह पीढ़ी-दर-पीढ़ी परिवार में रहती थी।
जब अंग्रेज़ों ने यह व्यवस्था तोड़ी — तब कोल समाज की जड़ें हिल गईं।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि | Historical Background
छोटानागपुर पर ब्रिटिश नियंत्रण:
छोटानागपुर क्षेत्र पर ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी का नियंत्रण धीरे-धीरे बढ़ा:
| वर्ष | घटना |
|---|---|
| 1765 | बंगाल की दीवानी — कंपनी का प्रशासनिक अधिकार |
| 1793 | स्थायी बंदोबस्त (Permanent Settlement) — नई भूमि व्यवस्था लागू |
| 1820 के दशक | छोटानागपुर में ब्रिटिश प्रशासन मज़बूत हुआ |
| 1820–1830 | बाहरी ज़मींदारों (दिकू) का प्रवेश — शोषण शुरू |
| 1831 | असंतोष चरम पर — विद्रोह भड़का |
“दिकू” — बाहरी लोगों का प्रवेश:
कोल लोग बाहर से आने वाले ग़ैर-आदिवासियों को “दिकू” कहते थे।
ये दिकू मुख्यतः तीन प्रकार के थे:
1. ज़मींदार (Zamindars): बाहर से लाए गए ज़मींदार जिन्होंने कोलों की भूमि हड़पी।
2. महाजन/साहूकार (Money-lenders): उच्च ब्याज पर ऋण देकर कोलों को कर्ज़ के जाल में फँसाया।
3. व्यापारी: वन उत्पादों का शोषण।
कोल विद्रोह के कारण | Causes of the Kol Rebellion
1. भूमि छिनना — सबसे बड़ा कारण
स्थायी बंदोबस्त (1793) ने छोटानागपुर में एक नई ज़मींदारी व्यवस्था लागू की।
बाहरी ज़मींदारों को कोलों की पारंपरिक भूमि का मालिक बना दिया गया। कोलों की “खुँटकट्टी” व्यवस्था को ब्रिटिश कानून ने मान्यता नहीं दी।
परिणाम:
- कोल अपनी ही ज़मीन पर बेदखल होने लगे
- जो पीढ़ियों से उनकी थी — वह रातोंरात ज़मींदार की हो गई
- वे अपनी ही ज़मीन पर बंधुआ मज़दूर बन गए
2. ऋण का जाल — महाजनों का शोषण
बाहरी महाजनों ने कोलों को चालाकी से ऋण के जाल में फँसाया:
- बीज, औज़ार, भोजन के लिए ऊँची ब्याज दर पर ऋण
- ऋण न चुकाने पर भूमि ज़ब्त
- पीढ़ियों तक कर्ज़ का बोझ
- ब्याज इतना ऊँचा कि मूल राशि कभी न चुकती
| ऋण व्यवस्था का दुष्चक्र | विवरण |
|---|---|
| ऋण लिया | बीज / भोजन / औज़ार के लिए |
| ब्याज दर | 50–200% तक |
| भुगतान न होने पर | ज़मीन ज़ब्त |
| परिणाम | कोल बंधुआ मज़दूर |
| अगली पीढ़ी | विरासत में कर्ज़ |
3. जंगल के अधिकार छिनना
कोलों के लिए जंगल केवल लकड़ी का स्रोत नहीं था — यह उनका घर, आजीविका और संस्कृति था।
ब्रिटिश वन नीतियों ने:
- जंगल पर कोलों के पारंपरिक अधिकार समाप्त किए
- लकड़ी काटने, शिकार करने और वन उत्पाद इकट्ठा करने पर प्रतिबंध
- वन क्षेत्रों में प्रवेश पर रोक
4. बेगारी प्रथा — जबरन मज़दूरी
ज़मींदार और अंग्रेज़ अधिकारी कोलों से बिना वेतन “बेगारी” (जबरन मज़दूरी) करवाते थे।
- खेत जोतो — पैसे नहीं
- सड़क बनाओ — पैसे नहीं
- माल ढोओ — पैसे नहीं
- इनकार करने पर — मार-पीट और कारावास
5. ब्रिटिश न्याय व्यवस्था से निराशा
जब कोलों ने ब्रिटिश अदालतों में न्याय माँगा:
- महँगी अदालती प्रक्रिया — कोल वहन नहीं कर सकते थे
- भाषा की बाधा — कोल अंग्रेज़ी नहीं जानते थे
- ज़मींदार और महाजन अदालत में घूस देते थे
- न्याय कभी नहीं मिला
“अंग्रेज़ों की अदालत में गरीब को न्याय नहीं” — यह विश्वास विद्रोह की आग को और भड़काता रहा।
6. सांस्कृतिक अपमान और धार्मिक भय
ईसाई मिशनरियों की गतिविधियाँ और अंग्रेज़ी शिक्षा नीतियों ने कोलों में यह भय पैदा किया कि उनकी परंपरागत संस्कृति और सरना धर्म खतरे में है।
विद्रोह का विस्फोट — 1831 | The Explosion of Revolt — 1831
विद्रोह की पहली चिंगारी:
1831 में रांची के आसपास के क्षेत्र में पहली घटनाएँ हुईं।
एक स्थानीय ज़मींदार के अत्याचार के विरुद्ध कोलों ने हथियार उठाए। यह आग तेज़ी से फैली।
बुद्धो भगत — विद्रोह का प्रमुख नायक:
बुद्धो भगत कोल विद्रोह के सबसे प्रमुख नेता थे।
| विवरण | जानकारी |
|---|---|
| नाम | बुद्धो भगत |
| गाँव | सिल्ली, रांची ज़िला (झारखंड) |
| जनजाति | मुंडा |
| भूमिका | विद्रोह के प्रमुख संगठक और नेता |
| विशेषता | धार्मिक और सामाजिक नेता — “भगत” की उपाधि |
| बलिदान | 1832 में ब्रिटिश सेना से लड़ते हुए वीरगति |
बुद्धो भगत ने धर्म और परंपरा को विद्रोह का आधार बनाया। उन्होंने कोलों को समझाया:
“हमारी भूमि, हमारे जंगल, हमारी आज़ादी — इन्हें कोई छीन नहीं सकता। यह हमारे पुरखों की धरोहर है।”
अन्य प्रमुख नेता:
| नेता | जनजाति / क्षेत्र | भूमिका |
|---|---|---|
| बुद्धो भगत | मुंडा, रांची | सर्वोच्च नेता |
| सुई मुंडा | मुंडा | रांची क्षेत्र में नेतृत्व |
| जोआ भगत | मुंडा | धार्मिक प्रेरणा |
| झिंदराई मानकी | हो, सिंहभूम | हो जनजाति का नेतृत्व |
| सिंदराई और बिंदराई मानकी | हो | सिंहभूम में विद्रोह |

विद्रोह का विस्तार | Spread of the Rebellion
भौगोलिक प्रसार:
कोल विद्रोह झारखंड से परे भी फैला:
| क्षेत्र | वर्तमान स्थान | विशेष घटना |
|---|---|---|
| रांची | झारखंड | विद्रोह का केंद्र — बुद्धो भगत |
| सिंहभूम | झारखंड | हो जनजाति का विद्रोह |
| पलामू | झारखंड | चेरो और खरवार जनजाति भी शामिल |
| मानभूम | झारखंड/पश्चिम बंगाल | भूमिज जनजाति का विद्रोह |
| हज़ारीबाग | झारखंड | व्यापक अशांति |
| बोनाई | ओडिशा | विद्रोह का प्रसार |
विद्रोह की कार्यशैली:
कोल विद्रोहियों ने अपने सीमित संसाधनों के बावजूद प्रभावी रणनीति अपनाई:
1. ज़मींदारों और महाजनों पर हमले: बाहरी ज़मींदारों और महाजनों के घर जलाए गए। उनके बही-खाते (ऋण रिकॉर्ड) नष्ट किए गए — क्योंकि इन्हीं बही-खातों में उनकी गुलामी लिखी थी।
2. ब्रिटिश प्रशासनिक केंद्रों पर आक्रमण: सरकारी दफ्तरों और चौकियों पर हमले।
3. तीर-धनुष और परंपरागत हथियार: कोलों के पास आधुनिक हथियार नहीं थे। वे तीर-धनुष, कुल्हाड़ी, भाले से लड़े।
4. गुरिल्ला युद्ध: जंगलों और पहाड़ियों की जानकारी का उपयोग — छापामार युद्ध शैली।
5. धार्मिक एकता: सरना धर्म और पुरखों की भूमि की रक्षा — यह भावनात्मक एकता का आधार था।
ब्रिटिश दमन | British Suppression
ब्रिटिश प्रतिक्रिया:
जब विद्रोह ने व्यापक रूप लिया, तो ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने कठोर कदम उठाए।
1832 में ब्रिटिश सेना ने बड़े पैमाने पर सैन्य अभियान चलाया:
| दमन की कार्रवाई | विवरण |
|---|---|
| सैन्य अभियान | नियमित सेना और पुलिस बल तैनात |
| गाँव जलाना | विद्रोही गाँवों को जलाया गया |
| सामूहिक गिरफ्तारियाँ | हज़ारों कोल गिरफ्तार |
| फाँसी और सज़ा | नेताओं को फाँसी या निर्वासन |
| सामूहिक दंड | पूरे गाँवों को दंडित किया |
बुद्धो भगत का बलिदान:
फरवरी 1832 में ब्रिटिश सेना ने बुद्धो भगत के गाँव सिल्ली को घेरा।
बुद्धो भगत ने आत्मसमर्पण नहीं किया। अपने 150 साथियों के साथ वे अंत तक लड़े।
बुद्धो भगत अपने दो पुत्रों और भाई के साथ वीरगति को प्राप्त हुए।
उनकी मृत्यु के साथ विद्रोह कमज़ोर पड़ने लगा — लेकिन समाप्त नहीं हुआ।
विद्रोह का दमन और परिणाम | Suppression and Aftermath
तत्काल परिणाम:
1832 के अंत तक ब्रिटिश सेना ने विद्रोह को दबा दिया।
- हज़ारों कोल मारे गए
- नेताओं को फाँसी दी गई या निर्वासित किया गया
- गाँव जलाए गए
- भारी जुर्माने लगाए गए
ब्रिटिश नीति में बदलाव:
विद्रोह इतना व्यापक था कि ब्रिटिश सरकार को अपनी नीतियों पर पुनर्विचार करना पड़ा:
| बदलाव | विवरण |
|---|---|
| दक्षिण-पश्चिम सीमांत एजेंसी (1833) | छोटानागपुर के लिए अलग प्रशासनिक व्यवस्था |
| रेगुलेशन III (1833) | आदिवासी क्षेत्रों में विशेष कानून |
| ज़मींदारी व्यवस्था में सुधार | कुछ सुधार — लेकिन आधे-अधूरे |
| पुलिस व्यवस्था | छोटानागपुर में विशेष पुलिस चौकियाँ |
हालाँकि ये सुधार पर्याप्त नहीं थे — इसीलिए आगे चलकर संथाल हूल (1855), सरदारी आंदोलन और बिरसा मुंडा आंदोलन (1899) हुए।
कोल विद्रोह और उसके बाद के आदिवासी विद्रोह | Kol Rebellion and Subsequent Tribal Uprisings
कोल विद्रोह एक श्रृंखला की पहली कड़ी था। इसने आदिवासी प्रतिरोध की परंपरा स्थापित की:
| विद्रोह | वर्ष | जनजाति | नेता | क्षेत्र |
|---|---|---|---|---|
| कोल विद्रोह | 1831–32 | कोल/मुंडा/हो | बुद्धो भगत | छोटानागपुर |
| भूमिज विद्रोह | 1832–33 | भूमिज | गंगा नारायण | मानभूम |
| संथाल हूल | 1855–56 | संथाल | सिद्धो-कान्हो | संथाल परगना |
| सरदारी आंदोलन | 1858–95 | मुंडा | — | छोटानागपुर |
| बिरसा मुंडा आंदोलन | 1899–1900 | मुंडा | बिरसा मुंडा | राँची |
| ताना भगत आंदोलन | 1914–20 | ओरांव | जतरा भगत | छोटानागपुर |
यह श्रृंखला बताती है कि आदिवासी समाज ने कभी अन्याय के सामने घुटने नहीं टेके।
कोल विद्रोह की तुलना अन्य समकालीन विद्रोहों से
| विद्रोह | वर्ष | क्षेत्र | कारण | परिणाम |
|---|---|---|---|---|
| कोल विद्रोह | 1831–32 | छोटानागपुर | भूमि, ऋण, जंगल | दमित, कुछ सुधार |
| वेलु थम्पी विद्रोह | 1808–09 | केरल | ब्रिटिश विस्तार | दमित |
| पाइक विद्रोह | 1817 | ओडिशा | भूमि और स्वतंत्रता | दमित |
| रामोसी विद्रोह | 1822–29 | महाराष्ट्र | आर्थिक शोषण | दमित |
| 1857 का विद्रोह | 1857 | पूरा उत्तर भारत | विविध | दमित — लेकिन नीतिगत बदलाव |
कोल विद्रोह का ऐतिहासिक महत्व | Historical Significance
1. भारत का प्रारंभिक स्वतंत्रता संग्राम:
कोल विद्रोह 1857 से 26 साल पहले हुआ। यह साबित करता है कि भारत में औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध प्रतिरोध बहुत पहले शुरू हो गया था — और वह प्रतिरोध आदिवासियों ने शुरू किया।
2. भूमि अधिकार आंदोलन की नींव:
खुँटकट्टी व्यवस्था की रक्षा का संघर्ष आगे चलकर छोटानागपुर टेनेंसी एक्ट (1908) की माँग का आधार बना — जो बिरसा मुंडा आंदोलन की बड़ी उपलब्धि थी।
3. आदिवासी अस्मिता का जागरण:
कोल विद्रोह ने आदिवासी समाज में “हम भी मनुष्य हैं, हमारे भी अधिकार हैं” — की चेतना जगाई।
4. ब्रिटिश नीतियों पर प्रश्नचिह्न:
विद्रोह की व्यापकता ने ब्रिटिश सरकार को आदिवासी क्षेत्रों के लिए अलग नीति बनाने पर विवश किया।
5. झारखंड की पहचान में योगदान:
कोल विद्रोह झारखंड की स्वतंत्रता-प्रेमी पहचान का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है। आज झारखंड में बुद्धो भगत को राष्ट्रीय नायक का दर्जा दिया जाता है।
बुद्धो भगत — विस्तृत परिचय | Budhu Bhagat — In Detail
बुद्धो भगत कोल विद्रोह के सबसे महत्वपूर्ण और प्रतीकात्मक नायक हैं।
जीवन:
बुद्धो भगत रांची ज़िले के सिल्ली गाँव के मुंडा थे। “भगत” उपाधि उन्हें उनकी धार्मिक आस्था और सामाजिक प्रतिष्ठा के कारण मिली थी।
वे अपने समाज में बहुत सम्मानित थे — एक धर्मनिष्ठ, साहसी और न्यायप्रिय व्यक्ति।
नेतृत्व शैली:
- धार्मिक प्रेरणा: उन्होंने कोलों को बताया कि पुरखों की भूमि की रक्षा करना धार्मिक कर्तव्य है
- संगठन कौशल: बिखरी हुई जनजातियों को एकजुट किया
- निडरता: ब्रिटिश सेना के सामने कभी नहीं झुके
- बलिदान: परिवार सहित युद्धभूमि में प्राण न्यौछावर किए
बुद्धो भगत की विरासत:
आज झारखंड सरकार ने बुद्धो भगत को राज्य के प्रमुख स्वतंत्रता सेनानियों में मान्यता दी है।
रांची में बुद्धो भगत की प्रतिमा और उनके नाम पर सरकारी योजनाएँ हैं।
छोटानागपुर टेनेंसी एक्ट — देरी से मिला न्याय | CNT Act — Justice Delayed
कोल विद्रोह से शुरू हुई भूमि-अधिकार की लड़ाई अंततः 1908 में आंशिक रूप से सफल हुई।
छोटानागपुर टेनेंसी एक्ट 1908 ने:
- आदिवासी भूमि को ग़ैर-आदिवासियों को हस्तांतरित करने पर रोक लगाई
- खुँटकट्टी अधिकारों को कानूनी मान्यता दी
- बेगारी पर प्रतिबंध लगाया
यह 1831 के विद्रोह का 77 साल बाद मिला न्याय था।
आधुनिक परिप्रेक्ष्य | Modern Perspective
झारखंड राज्य और कोल विद्रोह की विरासत:
15 नवम्बर 2000 को जब झारखंड अलग राज्य बना — तो यह उसी आदिवासी स्वायत्तता की माँग का परिणाम था जो कोल विद्रोह से शुरू हुई थी।
बिरसा मुंडा — झारखंड के सबसे बड़े नायक — का जन्मदिन 15 नवम्बर है — इसीलिए झारखंड की स्थापना इसी दिन हुई।
आज भी प्रासंगिक:
कोल विद्रोह की समस्याएँ आज भी पूरी तरह हल नहीं हुई हैं:
- आदिवासी भूमि अधिग्रहण का मुद्दा
- वन अधिकार कानून (2006) का क्रियान्वयन
- आदिवासी क्षेत्रों में खनन और विकास का संघर्ष
“जो लड़ाई 1831 में शुरू हुई, वह अभी भी जारी है।”
महत्वपूर्ण प्रश्न और उत्तर | FAQs
प्र. कोल विद्रोह कब और कहाँ हुआ?
उ. कोल विद्रोह 1831–1832 में मुख्यतः छोटानागपुर (वर्तमान झारखंड) में हुआ। यह रांची, सिंहभूम, पलामू और मानभूम तक फैला था।
प्र. कोल विद्रोह के प्रमुख कारण क्या थे?
उ. भूमि छिनना (खुँटकट्टी व्यवस्था का विनाश), महाजनों का ऋण-जाल, जंगल के अधिकार समाप्त होना, बेगारी प्रथा और ब्रिटिश न्याय व्यवस्था से निराशा — ये प्रमुख कारण थे।
प्र. कोल विद्रोह का प्रमुख नेता कौन था?
उ. बुद्धो भगत कोल विद्रोह के सबसे प्रमुख नेता थे। वे रांची ज़िले के सिल्ली गाँव के मुंडा थे जिन्होंने 1832 में ब्रिटिश सेना से लड़ते हुए अपने परिवार सहित वीरगति पाई।
प्र. खुँटकट्टी व्यवस्था क्या थी?
उ. यह मुंडा/कोल जनजाति की पारंपरिक भूमि-स्वामित्व व्यवस्था थी जिसमें जिस परिवार ने पहली बार जंगल काटकर ज़मीन बनाई, उसका उस पर स्थायी अधिकार था। यह भूमि बेची नहीं जा सकती थी। ब्रिटिश कानून ने इसे नष्ट कर दिया।
प्र. कोल विद्रोह का क्या परिणाम निकला?
उ. ब्रिटिश सेना ने विद्रोह दबाया। हालाँकि इसके बाद 1833 में दक्षिण-पश्चिम सीमांत एजेंसी बनाई गई और आदिवासी क्षेत्रों के लिए विशेष नियम बनाए गए। 1908 में छोटानागपुर टेनेंसी एक्ट से आदिवासी भूमि अधिकारों को आंशिक मान्यता मिली।
प्र. “दिकू” का क्या अर्थ था?
उ. “दिकू” कोल/आदिवासी लोगों द्वारा बाहर से आए ग़ैर-आदिवासियों के लिए प्रयुक्त शब्द था — मुख्यतः ज़मींदार, महाजन और व्यापारी जो शोषण करते थे।
कोल विद्रोह भारत के इतिहास का एक ऐसा अध्याय है जिसे मुख्यधारा के इतिहास ने लंबे समय तक उपेक्षित रखा।
लेकिन सच यह है कि जब बड़े राजा-महाराजे अंग्रेज़ों से समझौते कर रहे थे — तब छोटानागपुर के जंगलों में एक साधारण मुंडा व्यक्ति बुद्धो भगत और उनके साथी अपनी जान की बाज़ी लगाकर लड़ रहे थे।
उनके पास न तोपें थीं, न घोड़े, न प्रशिक्षित सेना — केवल तीर-धनुष, अटूट साहस और अपनी मातृभूमि से प्रेम।
यह विद्रोह हमें याद दिलाता है:
“स्वतंत्रता का संघर्ष केवल राजाओं और सिपाहियों का नहीं था — यह उन आदिवासियों का भी था जिनके नाम इतिहास की किताबों में कम मिलते हैं, लेकिन जिनकी वीरता किसी भी राजपूत या मराठा योद्धा से कम नहीं थी।”
कोल विद्रोह — 1857 से पहले का असली पहला स्वतंत्रता संग्राम।
- कोल विद्रोह | Kol Rebellion 1831-32: सम्पूर्ण इतिहास, कारण और महत्व - May 20, 2026
- OSSC CTSRE Recruitment 2026 – 646 Posts | Apply Online 30 May–29 June 2026 | ossc.gov.in - May 20, 2026
- South Indian Bank Recruitment 2026 – 3 Notifications Out | Junior Officer, IT Department, CISO Office & Data Science | Apply Online recruit.southindianbank.bank.in | Eligibility, Salary & Full Guide - May 19, 2026
