कल्पना करें — एक इमारत जिसके अंदर हिंदू मंदिर के खंभे हैं, जैन मंदिर की नक्काशी है, संस्कृत के शिलालेख हैं, कुरान की आयतें हैं और इस्लामी मेहराब हैं — सब एक ही छत के नीचे।
राजस्थान के अजमेर शहर में ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह से मात्र 500 मीटर की दूरी पर खड़ी है वह इमारत जो भारत की वास्तुकला, इतिहास और धार्मिक जटिलता का सबसे विचित्र और अद्भुत उदाहरण है।
अढ़ाई दिन का झोंपरा — यह नाम सुनने में जितना रहस्यमय लगता है, इसका इतिहास उससे भी अधिक जटिल और बहुआयामी है। यह भारत की उन चंद इमारतों में से है जहाँ हिंदू, जैन और इस्लामी वास्तुकला एक ही स्थान पर मिलती है — कभी सहजता से, कभी संघर्ष के निशानों के साथ।
इस लेख में अढ़ाई दिन के झोंपरे का पूरा इतिहास, इसके नाम का रहस्य, वास्तुकला की विशेषताएं, विवाद और आज की स्थिति — सब कुछ विस्तार से।
एक नज़र में | Quick Facts
| विषय | विवरण |
|---|---|
| स्थान | अंदर कोट रोड, अजमेर, राजस्थान |
| निर्माणकर्ता | कुतुबुद्दीन ऐबक (मुहम्मद गौरी के आदेश पर) |
| वास्तुकार | अबू बक्र, हेरात (अफगानिस्तान) |
| निर्माण आरंभ | 1192 ईस्वी |
| निर्माण पूर्ण | 1199 ईस्वी |
| इल्तुतमिश द्वारा परिष्कार | 1213 ईस्वी |
| मूल संरचना | संस्कृत महाविद्यालय (विग्रहराज IV द्वारा निर्मित, 1153 ईसा पूर्व से पहले) |
| वास्तुकला शैली | इंडो-इस्लामिक (आरंभिक) |
| खंभों की संख्या | 124 |
| गुंबदों की संख्या | 10 |
| संरक्षण | ASI (भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण) |
| दरगाह से दूरी | 500 मीटर |
| रेलवे स्टेशन से | 1.5 किमी |
| पुष्कर से | 14 किमी |
| समय | प्रातः 6 बजे से सायं 7 बजे तक |
| महत्व | भारत की सबसे पुरानी मस्जिदों में से एक और अजमेर का सबसे पुराना जीवित स्मारक |
“अढ़ाई दिन का झोंपरा” — नाम का रहस्य | Mystery of the Name
यह इमारत का नाम पहले मन में जिज्ञासा जगाता है — “अढ़ाई दिन का झोंपरा” यानी “ढाई दिन की झोंपड़ी”। इतने विशाल और भव्य स्मारक को यह नाम क्यों?
इस नाम के पीछे कई मान्यताएं हैं:
मान्यता 1 — ढाई दिन में निर्माण
सबसे प्रचलित किंवदंती यह है कि मुहम्मद गौरी ने कुतुबुद्दीन ऐबक को आदेश दिया कि इसे ढाई दिन (60 घंटे) में बनाया जाए। और ऐबक ने यह असंभव काम संभव करके दिखाया।
हालाँकि इतिहासकार इस मान्यता को पूर्णतः सत्य नहीं मानते — क्योंकि 1192 में निर्माण शुरू हुआ और 1199 तक पूरा हुआ। लेकिन हो सकता है कि पहले से मौजूद संरचना में कुछ परिवर्तन ढाई दिन में किए गए हों।
मान्यता 2 — मेला और उत्सव
ASI (भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण) के अनुसार, इस स्थान पर एक धार्मिक मेला लगता था जो ढाई दिन तक चलता था। इसी कारण इस स्थान को “अढ़ाई दिन का झोंपरा” कहा जाने लगा।
मान्यता 3 — जैन परंपरा
जैन परंपरा के अनुसार, 660 ईस्वी में सेठ वीरमदेव काला ने यहाँ एक जैन तीर्थस्थल बनाया था। उस स्थान पर ढाई दिन का उत्सव मनाया जाता था और यही नाम आगे चलकर पूरी इमारत के साथ जुड़ गया।
मान्यता 4 — सूफी परंपरा
एक अन्य मान्यता के अनुसार, किसी सूफी संत के उर्स (मृत्यु वर्षगांठ) पर यहाँ ढाई दिन का जलसा (उत्सव) होता था।
सबसे तर्कसंगत मान्यता: इतिहासकारों का मानना है कि यह नाम उस ढाई दिन के उत्सव या मेले से आया है जो यहाँ लगता था — न कि निर्माण की अवधि से।
इमारत का पूर्व इतिहास — हिंदू और जैन काल | Pre-Islamic History
अढ़ाई दिन के झोंपरे को समझने के लिए पहले उस ज़मीन को समझना ज़रूरी है जिस पर यह खड़ा है।
जैन श्राइन — 660 ईस्वी
जैन परंपरा के अनुसार, इस संरचना की शुरुआत 660 ईस्वी में हुई थी जब सेठ वीरमदेव काला ने यहाँ एक जैन तीर्थस्थल बनवाया था।
विग्रहराज IV (विशालदेव चौहान) का संस्कृत महाविद्यालय
अढ़ाई दिन के झोंपरे का मूल स्थल शाकंभरी चौहान वंश के राजा विग्रहराज IV द्वारा निर्मित एक संस्कृत महाविद्यालय था। इस स्थल पर मिली एक शिला के आधार पर, मूल इमारत का निर्माण 1153 ईस्वी से पहले हुआ होगा।
विग्रहराज IV को “विशालदेव” के नाम से भी जाना जाता है। वे पृथ्वीराज चौहान के पूर्वज थे। उन्होंने इस स्थान पर “सरस्वती कंठाभरण महाविद्यालय” — यानी सरस्वती की प्रतिष्ठा करने वाला संस्कृत विद्यालय — स्थापित किया था।
इस महाविद्यालय के बारे में महत्वपूर्ण साक्ष्य:
| साक्ष्य | विवरण |
|---|---|
| मुख्य द्वार का शिलालेख | मस्जिद के मुख्य द्वार के बायीं ओर संगमरमर पर संस्कृत में खुदे शिलालेख |
| देवी-देवताओं की मूर्तियाँ | इधर-उधर बिखरी सैकड़ों खंडित प्रतिमाएं |
| खंभों पर खंडित मूर्तियाँ | हिंदू मंदिर शैली के खंभों पर मूर्तिकारी के अवशेष |
| सरस्वती मंदिर | अंदर एक विष्णु और सरस्वती मंदिर के साक्ष्य |
अध्ययनों से पता चलता है कि मस्जिद बनाने के लिए लगभग 20 से 30 हिंदू मंदिरों को ध्वस्त किया गया होगा।
इस्लामी काल — निर्माण और रूपांतरण | Islamic Period — Construction
1192 — पृथ्वीराज चौहान की पराजय और बदलाव
1192 ईस्वी में तराईन के द्वितीय युद्ध में पृथ्वीराज चौहान की पराजय के बाद, कुतुबुद्दीन ऐबक ने मुहम्मद गौरी के आदेश पर इस इमारत के निर्माण की शुरुआत की।
तराईन का द्वितीय युद्ध (1192) भारतीय इतिहास का एक निर्णायक मोड़ था। पृथ्वीराज चौहान की हार के बाद उत्तर भारत में मुस्लिम सत्ता की स्थापना हुई। विजय के प्रतीक के रूप में अजमेर में एक मस्जिद बनाने का निर्णय लिया गया।
वास्तुकार — अबू बक्र, हेरात
इस मस्जिद का डिज़ाइन हेरात के अबू बक्र ने तैयार किया था, और हिंदू राजमिस्त्रियों और मज़दूरों ने इस अलंकृत संरचना का निर्माण किया।
यह एक महत्वपूर्ण तथ्य है — इस्लामी आदेश पर, ईरानी वास्तुकार के डिज़ाइन से और हिंदू कारीगरों के हाथों बनी इमारत। यही कारण है कि इसमें हिंदू, जैन और इस्लामी तत्वों का अनोखा सम्मिश्रण दिखता है।
निर्माण का तरीका
यह मस्जिद आसपास के हिंदू और जैन मंदिरों के खंडहरों से प्राप्त सामग्री का उपयोग करके बनाई गई थी।
इसीलिए मस्जिद के अंदर:
- हिंदू मंदिर के खंभे दिखते हैं (मूर्तियों को छिपाकर या काटकर)
- जैन शैली की नक्काशी मिलती है
- हिंदू-जैन स्थापत्य की बारीकियाँ मिलती हैं
1199 — निर्माण पूर्ण
इमारत 1199 ईस्वी में पूर्ण हुई। अर्थात निर्माण में लगभग सात वर्ष लगे — न कि ढाई दिन।
1213 — इल्तुतमिश का योगदान
इल्तुतमिश ने 1213 ईस्वी में इसे और सुंदर बनाया।
बाद में 1230 ईस्वी में, सुल्तान अल्तमश ने एक उठे हुए मेहराब के नीचे एक जाली (जालीदार स्क्रीन) जोड़ी।
वास्तुकला की विशेषताएं | Architectural Features
अढ़ाई दिन का झोंपरा इंडो-इस्लामिक वास्तुकला का सबसे आरंभिक और क्लासिक उदाहरण माना जाता है।
बाहरी संरचना — प्रवेश द्वार और मुखभाग
मुख्य मेहराब के दोनों ओर छह छोटे अरबी मूल के मेहराब हैं जिनमें छोटे आयताकार पैनल एक प्रकाश प्रणाली का काम करते थे — यह विशेषता प्राचीन अरबी मस्जिदों में पाई जाती है।
सात-मेहराब वाली दीवार: अढ़ाई दिन के झोंपरे की सबसे प्रभावशाली विशेषता इसकी सात-मेहराब वाली अग्रभाग की दीवार है जो कुरान की आयतों से अंकित है।
यह अग्रभाग दीवार पीले बलुआ पत्थर से बनी है और इस पर कुरान की आयतें उकेरी गई हैं। यह पाँच मीटर ऊँची और लंबी दीवार अजमेर के दृश्य में एक शानदार छाप छोड़ती है।
आंतरिक संरचना — 124 खंभे और 10 गुंबद
मस्जिद में 10 गुंबद हैं जो 124 खंभों पर टिके हैं। मुख्य हॉल की दीवारें सूर्यप्रकाश को प्रवेश देने के लिए छोटी जालियों में काटी गई हैं।
खंभों की विशेषता:
मस्जिद का आंतरिक भाग हिंदू मंदिर जैसा अधिक लगता है जहाँ मुख्य हॉल अनेक स्तंभों पर टिका है। तीन खंभे एक-दूसरे के ऊपर रखे गए हैं जबकि छत वर्गाकार बे पर टिकी है। खंभों का असामान्य डिज़ाइन है, अत्यंत सज्जित और हिंदू तथा जैन रॉक मंदिरों के समान। उनका आधार बड़ा और गोलाकार है जो ऊँचाई के साथ पतला होता जाता है।
| खंभों की विशेषता | विवरण |
|---|---|
| शैली | हिंदू-जैन मंदिर परंपरा |
| सजावट | जटिल नक्काशी, पुष्प और ज्यामितीय आकार |
| तीन स्तरीय | एक के ऊपर एक तीन खंभे |
| मूल | हिंदू और जैन मंदिरों की सामग्री से |
प्रांगण (Courtyard)
एक विशाल प्रांगण है जो 70 गुंबदयुक्त खंभों की एक सुंदर आर्केड से घिरा है।
जाली का काम (Lattice Screen)
इल्तुतमिश द्वारा जोड़ी गई जाली (जालीदार पर्दा) इस इमारत की एक और विशेषता है। यह पत्थर में बनी जालीदार स्क्रीन बेहद नाजुक और कुशल कारीगरी का नमूना है।
शिलालेख
इमारत में दो प्रकार के शिलालेख मिलते हैं:
- संस्कृत शिलालेख — मूल हिंदू/चौहान काल के
- अरबी/कुफिक शिलालेख — कुरान की आयतें और निर्माण संबंधी
कुफिक शिलालेख: कुफिक अरबी की एक प्राचीन लिपि है जिसका उपयोग इस्लामी वास्तुकला में सजावट के रूप में किया जाता था।
इंडो-इस्लामिक वास्तुकला का प्रथम उदाहरण | First Example of Indo-Islamic Architecture
यह इंडो-इस्लामिक वास्तुकला का पहला और सबसे क्लासिक उदाहरण है।
इंडो-इस्लामिक वास्तुकला वह शैली है जिसमें भारतीय (हिंदू-जैन) और इस्लामी निर्माण तत्व मिलकर एक नई शैली बनाते हैं।
| भारतीय तत्व | इस्लामी तत्व |
|---|---|
| स्तंभ और उनकी सजावट | मेहराब (Arches) |
| गुंबद का भार स्तंभों पर | कुफिक शिलालेख |
| पुष्प और पत्र अलंकरण | मिहराब (Qibla की दिशा) |
| कॉर्बेल्ड छत | अरबी प्रकाश प्रणाली |
| जैन-हिंदू नक्काशी | मस्जिद की योजना |
अढ़ाई दिन के झोंपरे के बाद यही इंडो-इस्लामिक परंपरा आगे विकसित होती गई और दिल्ली सल्तनत, मुगल वास्तुकला और अंततः ताजमहल तक पहुँची।
वास्तुकला तुलना — कुतुब मीनार परिसर से | Comparison with Qutub Minar Complex
अढ़ाई दिन के झोंपरे और दिल्ली के कुतुब मीनार परिसर की “कुव्वत-उल-इस्लाम मस्जिद” में बहुत समानताएं हैं — क्योंकि दोनों एक ही काल, एक ही निर्माणकर्ता (कुतुबुद्दीन ऐबक) और एक ही तकनीक के उत्पाद हैं।
| पहलू | अढ़ाई दिन का झोंपरा | कुव्वत-उल-इस्लाम |
|---|---|---|
| स्थान | अजमेर | दिल्ली |
| निर्माणकर्ता | कुतुबुद्दीन ऐबक | कुतुबुद्दीन ऐबक |
| काल | 1192–1199 | 1193 |
| मूल स्थल | संस्कृत महाविद्यालय | 27 हिंदू-जैन मंदिर |
| सामग्री | मंदिर खंडहर | मंदिर खंडहर |
| विशेषता | सात-मेहराब दीवार | लौह स्तंभ |
विवाद और आधुनिक दृष्टिकोण | Controversy and Modern Perspective
अढ़ाई दिन का झोंपरा आज भी विवाद के केंद्र में है।
पहचान का विवाद
अजमेर के उप महापौर नीरज जैन ने यह दावा दोहराया है कि आक्रांताओं द्वारा ध्वस्त किए जाने से पहले यह भवन मूल रूप से संस्कृत महाविद्यालय और मंदिर था।
ऐतिहासिक सत्य
इतिहासकारों में इस पर अलग-अलग मत हैं:
| मत | आधार |
|---|---|
| यह मूलतः संस्कृत विद्यालय था | संस्कृत शिलालेख, हिंदू-जैन स्थापत्य |
| जैन तीर्थस्थल भी था | जैन परंपरा के अनुसार 660 ई. में निर्माण |
| इस्लामी रूपांतरण | 1192 में निर्माण के ऐतिहासिक प्रमाण |
ASI का रुख: भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण इसे एक संरक्षित स्मारक के रूप में देखता है और सभी तत्वों को ऐतिहासिक रूप से स्वीकार करता है।
1947 के बाद की स्थिति
1947 के बाद यह मस्जिद के रूप में सक्रिय नहीं रही। ASI ने इसे एक ऐतिहासिक संरक्षित स्मारक के रूप में अपने संरक्षण में लिया है।
अजमेर में स्थिति और परिवेश | Location and Surroundings
खड़कवासला की भौगोलिक स्थिति
अढ़ाई दिन का झोंपरा अजमेर के अनासागर झील के पास, अजमेर शहर के पुराने हिस्से में स्थित है।
| स्थान | दूरी |
|---|---|
| दरगाह ख्वाजा साहब | 500 मीटर |
| अजमेर रेलवे स्टेशन | 1.5 किमी |
| पुष्कर | 14 किमी |
| किशनगढ़ हवाई अड्डा | 27 किमी |
| जयपुर | 135 किमी |
आसपास के दर्शनीय स्थल
| स्थल | विवरण |
|---|---|
| दरगाह ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती | भारत का सबसे प्रसिद्ध सूफी तीर्थस्थल |
| अनासागर झील | सुंदर ऐतिहासिक झील |
| तारागढ़ किला | अजमेर का प्राचीन दुर्ग |
| पुष्कर | ब्रह्मा मंदिर और पवित्र झील |
| अजमेर संग्रहालय | मेयो कॉलेज में |
पर्यटन जानकारी | Tourism Information
कैसे पहुँचें
| मार्ग | विवरण |
|---|---|
| रेल | अजमेर जंक्शन — जयपुर, दिल्ली, मुंबई से जुड़ा |
| सड़क | NH-48 (दिल्ली-अजमेर), NH-58 |
| हवाई | किशनगढ़ एयरपोर्ट (27 किमी) |
| जयपुर से | 135 किमी — 2.5 घंटे |
| दिल्ली से | 440 किमी — 5-6 घंटे |
जाने का सबसे अच्छा समय
| मौसम | समय | विशेषता |
|---|---|---|
| शीतकालीन | अक्टूबर–मार्च | सबसे अच्छा — सुखद मौसम |
| मानसून | जुलाई–सितंबर | हरियाली पर गर्मी |
| ग्रीष्मकाल | अप्रैल–जून | बहुत गर्म — असुविधाजनक |
सुझाव: सुबह जल्दी (6-9 बजे) या शाम को (4-7 बजे) जाएं जब रोशनी अच्छी हो और तापमान भी कम।
प्रवेश शुल्क और समय
| विवरण | जानकारी |
|---|---|
| समय | प्रातः 6 बजे से सायं 7 बजे तक, प्रतिदिन |
| प्रवेश शुल्क | न्यूनतम (ASI द्वारा निर्धारित) |
| फोटोग्राफी | अनुमत |
UPSC और परीक्षा की दृष्टि से | UPSC/Exam Perspective
भारतीय वास्तुकला में महत्व
अढ़ाई दिन का झोंपरा UPSC और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं की दृष्टि से निम्न कारणों से महत्वपूर्ण है:
1. इंडो-इस्लामिक वास्तुकला का पहला उदाहरण: यह उस स्थापत्य परंपरा का आरंभिक बिंदु है जो बाद में मुगल वास्तुकला तक विकसित हुई।
2. दिल्ली सल्तनत का प्रथम चरण: कुतुबुद्दीन ऐबक द्वारा निर्मित — दिल्ली सल्तनत के संस्थापक का एक प्रमुख निर्माण कार्य।
3. सांस्कृतिक संमिश्रण: यह इमारत भारत की उस बहुस्तरीय सांस्कृतिक पहचान का उदाहरण है जहाँ विभिन्न परंपराएं एक दूसरे को प्रभावित करती हैं।
परीक्षा उपयोगी तथ्य | Key Facts for Exams
| प्रश्न | उत्तर |
|---|---|
| स्थान | अजमेर, राजस्थान |
| निर्माणकर्ता | कुतुबुद्दीन ऐबक |
| किसके आदेश पर | मुहम्मद गौरी |
| वास्तुकार | अबू बक्र, हेरात |
| निर्माण आरंभ | 1192 ईस्वी |
| निर्माण पूर्ण | 1199 ईस्वी |
| इल्तुतमिश का योगदान | 1213 ईस्वी — सौंदर्यीकरण; 1230 — जाली जोड़ी |
| खंभों की संख्या | 124 |
| गुंबदों की संख्या | 10 |
| मूल संरचना | संस्कृत महाविद्यालय (विग्रहराज IV / विशालदेव चौहान) |
| मूल नाम | सरस्वती कंठाभरण महाविद्यालय |
| वास्तुकला शैली | इंडो-इस्लामिक (आरंभिक) |
| सातवाँ मेहराब | सात-मेहराब की अग्रभाग दीवार |
| संरक्षण | ASI (Archaeological Survey of India) |
| तराईन का द्वितीय युद्ध | 1192 — पृथ्वीराज चौहान पराजित |
| यह इमारत क्यों प्रसिद्ध है | इंडो-इस्लामिक का पहला उदाहरण, अजमेर का सबसे पुराना स्मारक |
महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर | FAQs
प्र. अढ़ाई दिन का झोंपरा कहाँ है?
उ. यह राजस्थान के अजमेर शहर में दरगाह ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती से 500 मीटर और अजमेर रेलवे स्टेशन से 1.5 किमी की दूरी पर स्थित है।
प्र. अढ़ाई दिन का झोंपरा किसने बनवाया?
उ. इसे कुतुबुद्दीन ऐबक ने मुहम्मद गौरी के आदेश पर 1192–1199 ईस्वी में बनवाया। इसके वास्तुकार हेरात (अफगानिस्तान) के अबू बक्र थे।
प्र. “अढ़ाई दिन का झोंपरा” नाम क्यों पड़ा?
उ. इसके नाम के पीछे कई मान्यताएं हैं। सबसे प्रचलित यह है कि इसे ढाई दिन में बनाया गया था, जबकि ASI का मानना है कि यह नाम यहाँ लगने वाले ढाई दिन के मेले से आया है। इतिहासकार दोनों मान्यताओं पर एकमत नहीं हैं।
प्र. अढ़ाई दिन के झोंपरे का पहले क्या था?
उ. यह स्थान मूल रूप से चौहान राजा विग्रहराज IV द्वारा 1153 ईस्वी से पहले निर्मित “सरस्वती कंठाभरण महाविद्यालय” — एक संस्कृत शिक्षण संस्थान था। कुछ मान्यताओं के अनुसार इससे भी पहले यहाँ एक जैन तीर्थस्थल था।
प्र. अढ़ाई दिन के झोंपरे की वास्तुकला की क्या विशेषताएं हैं?
उ. यह इंडो-इस्लामिक वास्तुकला का पहला उदाहरण है। इसमें 124 खंभे, 10 गुंबद, सात-मेहराब की अग्रभाग दीवार और इल्तुतमिश द्वारा जोड़ी गई जाली है। खंभे हिंदू-जैन मंदिर शैली के हैं और मेहराब अरबी परंपरा के।
प्र. अढ़ाई दिन के झोंपरे जाने का सबसे अच्छा समय कब है?
उ. अक्टूबर से मार्च का शीतकाल सबसे उपयुक्त है। सुबह 6 से 9 बजे या शाम 4 से 7 बजे जाने से प्राकृतिक रोशनी में इमारत की सुंदरता का पूरा अनुभव होता है।
निष्कर्ष | Conclusion
अढ़ाई दिन का झोंपरा केवल एक इमारत नहीं है — यह भारत के इतिहास के एक जटिल और बहुस्तरीय अध्याय का पत्थर-पन्ना है।
इसकी हर ईंट में एक कहानी है। संस्कृत के शिलालेख बताते हैं कि यहाँ ज्ञान की देवी सरस्वती की पूजा होती थी। जैन नक्काशी के अवशेष बताते हैं कि यह भूमि शताब्दियों से पूजनीय थी। हिंदू खंभे बताते हैं कि इस्लामी शासन ने यहाँ की सामग्री का उपयोग तो किया, लेकिन भारतीय कारीगरों की कला को नकार नहीं सका। और इस्लामी मेहराब और कुरान की आयतें बताती हैं कि यह एक नए युग का आरंभ था।
यह इमारत इसीलिए महत्वपूर्ण है — न इसलिए कि यह किसी एक धर्म या संस्कृति का प्रतीक है, बल्कि इसलिए कि यह बताती है कि भारत का इतिहास कभी एकरेखीय नहीं रहा। यहाँ परतें हैं — संघर्ष की, सह-अस्तित्व की, रूपांतरण की और संरक्षण की।
अढ़ाई दिन का झोंपरा देखने जाएं — और उन खंभों को छूकर महसूस करें जिन पर कभी मंदिर के फूल चढ़े थे और अब जिनके ऊपर मस्जिद का गुंबद है।
यही भारत है।
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